Habitat Screening pic Vijay Kumar

Habitat Screening pic Vijay Kumar

We kickstart this blog with news of the first public preview of Red Ant Dream, on May 7, 2013 at the India Habitat Centre, New Delhi. Sanjay Joshi from प्रतिरोध का सिनेमा (Cinema of Resistance) introduced the screening  by briefly introducing the context within which political resistance and documentary film were framed today. माटी के लाल, the Hindi language version of Red Ant Dream, was first screened by the Cinema of Resistance team at the 8th Gorakhpur Film Festival on February 22, 2013, and then a week later at the Banaras Film Festival. Happily, at 7 pm sharp, every one of the 425 seats was taken, with at least a 125 people sitting on the carpets (and some who stood at the back through the 120 minutes) – the Habitat staff had to disappoint at least 50 people, who were turned away from the gates.

We are also sharing this report from Sudhir Suman, who is associated with Jan Sanskriti Manch and the journal Samkaleen Janmat:

संजय काक की नयी फिल्म RED ANT DREAM का पहला प्रदर्शन

7 मई की शाम इंडिया हैविटेट के स्टेन आडिटोरियम में संजय काक की नई फिल्म ‘माटी के लाल’ के अंग्रेजी संस्करण RED ANT DREAM की पहली प्रिव्यू स्क्रीनिंग हुई। आडिटोरियम पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ की ओर से संजय जोशी ने फिल्म को प्रस्तुत करते हुए कहा कि जब कंडकुलम में परमाणु रिएक्टर लगाने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ रहा है, जब महाराष्ट्र में कबीर कला मंच के इंकलाबी संस्कृतिकर्मी जेल में डाले जा रहे हैं, जब उड़ीसा में बांध विरोधी आंदोलन के दौरान पत्रकारों पर पुलिसिया दमन ढाया जा रहा है, जब जनांदोलनों और एनजीओ के समन्वय की कोशिश करने वाली संस्था ‘इंसाफ’ का बैंक खाता सीज किया जा रहा है, तब RED ANT DREAM को देखना दरअसल अपने आप को संघर्ष के लिए तैयार करने की तरह है। सरकार चाहती है कि सिर्फ और सिर्फ कारपोरेट राज चले, लेकिन उसके मंसूबों के खिलाफ इस देश में जनता के राज का स्वप्न अभी भी जीवित है, यह फिल्म जनता के इंकलाबी सपनों की तहकीकात है।

Habitat Q&A pic Apal

Habitat Q&A pic Apal

पूरे दो घंटे की इस फिल्म को देखते हुए दर्शक शुरू से अंत तक आडोरियम में मौजूद रहे। यह फिल्म पंजाब में शहीद-ए-आजम भगतसिंह और इंकलाबी कवि पाश के शहादत दिवस पर होने वाले आयोजनं और छतीसगढ़ में जल जंगल जमीन के लिए जारी आदिवासियों के संघर्ष पर हो रहे राज्य दमन और उसके प्रतिरोध के बीच इंकलाबी सपनों के सूत्र तलाशने की कोशिश करती है। नियमगिरी जहां सशस्त्र प्रतिरोध के बजाए मजबूत जनांदोलन है, कैमरा वहां भी पहुंचता है और कैमरे की जद में दुराग्रह और बर्बर मंशा से प्रेरित सैन्य अभियान और सलवा जुडूम की सच्चाइयां भी आती हैं। असल में यह फिल्म माओवादियों के प्रतिहिंसक प्रतिरोध का भी एक तर्क पेश करती है और इसके लिए फिल्मकार ने भगतसिंह की मशहूर उक्ति का सहारा लिया है, जिसमें उन्होंने कहा था- ‘‘हो सकता है कि यह लड़ाई भिन्न-भिन्न दशाओं में भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण करे। किसी समय यह लड़ाई प्रकट रूप ले ले, कभी गुप्त दशा में चलती रहे, कभी भयानक रूप धारण कर ले, कभी किसान के स्तर पर युद्ध जारी रहे और कभी यह घटना इतनी भयानक हो जाए कि जीवन और मृत्यु की बाजी लग जाए। चाहे कोई भी परिस्थिति हो, इसका प्रभाव आप पर पड़ेगा। यह आप की इच्छा है कि आप जिस परिस्थिति को चाहे चुन लें, परन्तु यह लड़ाई जारी रहेगी। इसमें छोटी -छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा। बहुत सभव है कि यह युद्ध भयंकर स्वरूप ग्रहण कर ले। पर निश्चय ही यह उस समय तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि समाज का वर्तमान ढाँचा समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन या क्रांति समाप्त नहीं हो जाती और मानवी सृष्टि में एक नवीन युग का सूत्रपात नही हो जाता।’’ पाश की कविताओं के जरिए यह फिल्म इंडियन स्टेट के चरित्र पर तीखे सवाल उठाती है, खासकर देश की सुरक्षा के नाम पर जनता के अधिकारों को रौंदने की उसकी प्रवृत्ति को प्रश्नचिह्नित करती है। पाश की ही मशहूर पंक्ति मानो इस फिल्म का अंतिम निष्कर्ष है -
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरुरत होगी
और हम लड़ेंगे साथ
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए

Habitat Q&A pic Apal Singh

Habitat Q&A pic Apal Singh

फिल्म में माओवादियों के सशस्त्र दस्तों के कामरेडों की गतिविधियों से दर्शक रूबरू होते हैं। सरकारी प्रचार माध्यमों के विपरीत उनकी संवेदनशील और जनप्रिय छवि को यह फिल्म पेश करती है। फिल्म देखते हुए यह स्पष्ट महसूस होता है कि इस सशस्त्र संघर्ष की बड़ी वजह प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए जनता पर किया जा रहा शासकीय दमन है। सरकार ने जनता की आवाज को सुनने का कोई लोकतांत्रिक स्पेस नहीं छोड़ा है। फिल्म के प्रदर्शन के बाद विकास के माडल, मध्यवर्ग की उपभोक्तावादी संस्कृति और जनता के प्रतिरोध से उसका अलगाव, जनता के संघर्ष की रणनीति और राजनीति को लेकर कई दर्शकों ने सवाल किये। जिसके जवाब में फिल्मकार संजय काक और फिल्म के संपादक और सहलेखक तरुण भारतीय ने कहा कि जनता अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है, यही उम्मीद है। जिस दौर में क्रांति की बात को मजाक समझा जाने लगा है, उस दौर में क्रांति की उम्मीद को जीना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सुधीर सुमन
प्रतिरोध का सिनेमा अभियान के लिए
Habitat Books