अगर देश की सुरक्षा यही होती है कि बेजमीरी ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए... पंजाब के क्रांतिकारी कवि पाश की कविता की यह पंक्तियाँ माटी के लाल को जमीर के दौर में लौटाती हैं। ऐसी दुनिया जहां लोग अभी भी गैर बराबरी और अन्याय के खिलाफ डटकर खड़े हैं और एक नयी समानता भरी दुनिया के खतरनाक स्वप्न रचते हैं। फ़िल्म 'असुरक्षाओं' के घोषित खतरनाक और स्वप्निल इलाकों में विचरती है - मध्य भारत में बस्तर, जहाँ माओवादी हथियारबंद दस्तों ने सरकार के लिए सबसे गंभीर चुनौती खड़ी की है, पूर्वी भारत के ओडीसा, जहां समाजवाद का एक पुराना धड़ा आज भी प्रतिरोध के अपने उग्र - अलबत्ता गैरहथियारबंद - विश्वास के साथ खड़ा है। और फिर पंजाब, नई अर्थव्यवस्था के साथ हुए सफल साक्षात्कार का जश्न मनाता पंजाब, जहां आशा के नए आदर्श, इंकलाबी देशभक्त भगत सिंह की करिश्माई छवि के इर्द-गिर्द बुने जा रहे हैं। माटी के लाल एक तहकीकात है इंकलाबी सपनों और संभावनाओं की, एक ऐसे तथाकथित समय में जब वर्तमान यह दंभ भरता है कि भविष्य को उसने लील लिया है और इतिहास बस एक किताबी बात है। +
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